Hindi Real Life Story

ठेले वाला की कहानी सच्ची घटना पे आधारित Thela wala

“अरे, तू आज भी जाएगा क्या?”

“अम्मा, तू ही तो बोली अभी समय है। ठेले पर बस पाँच दर्जन केले हैं। रात भर जैसे-तैसे बचा कर रखा, जैसे- जैसे धूप खुलेगी, इनको गलना ही है। बस एक-दो कॉलोनी घूम कर वापस आ जाऊंगा। आज तेरे कहने पर मैं मंडी भी नहीं गया।”
“वो तो ठीक है लेकिन दोपहर तक बहू को अस्पताल ले ही जाना पड़ेगा, तब तक तो आ ही जाना। आज मन बहुत घबरा रहा है।”
“का अम्मा तू भी, अब तू ही घबराएगी तो उसे कौन संभालेगा? दोपहर होने में अभी बहुत समय है। सस्ता मद्दा बिक गया तो ठीक नहीं तो नौ बजे के पहले ही लौट आऊंगा। चौराहे तक भी ना जाऊंगा।अच्छा सुन अम्मा, ये पचास रुपये और रख ले अगर ये केले बिक गए तो दो-ढाई सौ तो हाथ आ ही जाएंगे अभी कुल आठ सौ ही हुए होंगे ना? मैं सोच रहा था, हजार रुपिया हाथ में रहता तो सही था, पता नहीं कितना खर्चा आये?”
 
“अरे, तू चिंता मत कर, हम सब पता किए हैं, सरकारी अस्पताल में ज्यादा पइसा नहीं लगता। थोड़ा दवाई के पीछे जाएगा बस।”
“अच्छा अम्मा , मैं चलता हूं अपना ध्यान रखना।”
“केले ले लो……. केले……. बढ़िया बढ़िया केले…..” चिल्लाते हुए भोला कॉलोनी की एक गली घूम आया। एक भी दरवाजा नहीं खुला।
“ये सहर वालों की नींद कितनी देर में खुलती है? मैं भी तो पागल हूं मुंह अंधेरे केले बेचने निकला हूं। दो- तीन गली और घूम आता हूं, क्या पता कोई जाग ही गया हो।”
खुद से बातें करते भोला के कदम थोड़े मंद पड़ गए थे। तभी हाई वोल्टेज तार खंभे से टूटकर बहुत तेज चमकती बिजली के साथ जमीन पर गिरा। भोला कांपते कदमों से धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
“आज तो बस अम्मा के आशीर्वाद से बच गया। अगर थोड़ा भी तेजी दिखाई होती तो ये बिजली का तार तो मुझे सुलगा ही देता।”
सड़क पर सतर्कता के साथ ठेले वाला को निकालकर भोला सोच ही रहा था कि इस तार की बिजली कैसे जाएगी? तभी एक मोटरसाइकिल वाला आता हुआ दिखा।
“अरे साहब, संभाल के बिजली का तार टूटा है। करंट दौड़ रहा है, इसमें। आगे मत जाइए चिपका लेगा।” “ओहो, ये बिजली विभाग वाले, सड़ी तारे लगा रखी है, टूटेंगी नहीं तो और क्या होगा?”
“लेकिन साहब ये करंट दौड़ना कैसे बंद होगा, इसमें?”
“बिजली विभाग फोन करना पड़ेगा। मैं फोन लगाता हूं। कुछ कदम पर पुलिस चौकी है, जाते-जाते उन्हें भी बता दूंगा। वो आकर हटवा देंगे।”
ठेला वाला
भोला उस आदमी को मोबाइल पर उंगलियाँ फेरते देख निश्चिंत होकर आगे बढ़ गया। दूसरी गली में बड़ी उम्मीद से एक-एक घर के सामने केले खरीदने की गुहार लगा रहा था। गली के आखिरी घर में उसे गेट के बाहर पानी फैला हुआ दिखा। उसने अंदाजा लगाया कि घर के बाहर धुलाई हुई है। मतलब कोई ना कोई तो जाग ही रहा होगा और घर के सामने पहुंच कर उसने ठेला लगभग खड़ा कर दिया।
“केले ले लो……केले….बढ़िया…बढ़िया…केले…” 
बहुत देर तक आवाज लगाने के बाद भी जब कोई नहीं निकला तो भोला मायूस होकर लौटने लगा। 
तभी एक महिला गीला तौलिया बालों में लपेटे भागती हुई बाहर आयी।
“अरे ठेले वाले, रोकना जरा।”
“आ जाओ, मैडम जी। बढ़िया केले हैं।”
“बढ़िया तो नहीं दिख रहे हैं।”
“कैसे दिए?”
“पचास रुपये दर्जन, मैडम जी।”
“क्या लूट मचा रखी है, तुम लोगों ने?पचास में कहीं केले बिकते हैं?”
“यही रेट है मैडम, आपको तो पता ही होगा।”
“सही सही दाम लगाओ।”
“कितना चाहिए, आपको?”
“चार दर्जन।”
“चलो, पैंतालीस लगा देता हूं।”

“चालीस, 
चालीस में देना है, तो दो, नहीं तो रहने दो। मजबूरी है, इसलिए रोका तुम्हें, नहीं तो मैं तुम ठेले वालों की लाई चीजों पर विश्वास नहीं करती।”

ठेला वाला
“अरे मैडम जी, ऐसी बात नहीं है। हम भी उसी मंडी से लाते हैं, जहां से आप खरीद कर लाते हो। आप ऐसा करो दो सौ दे दो और ये कुल पांच दर्जन है, सब ले लो।” महिला को सौदा फायदे का लगा, उसने झट से हां कर दी। भोला मन ही मन भगवान को धन्यवाद दे रहा था। तभी वो महिला कुछ पचास के नोट, कुछ दस के नोट और कुछ सिक्के गिनती बाहर आई।
“आज मेरे बेटे का जन्मदिन है, दस साल का हो गया उसी के लिए सत्यनारायण भगवान की कथा रखवायी है, इसलिए सबेरे-सबेरे लेना पड़ा। वरना मैं ठेले वाला से फल नहीं खरीदती।”
“अरे मैडम जी, आज मेरी घरवाली को भी बच्चा होने वाला है। ये दस रूपये मेरी तरफ से आप भगवान को चढ़ा देना और अपने भगवान जी से कहना कि मेरी होने वाली औलाद को मेरी भी उमर लग जाए।”
उस महिला ने मुस्कुराते हुए भोला से दस का नोट लिया और बोली, “बिल्कुल अर्जी लगा देंगे, तुम्हारी तरफ से। उनके दरबार में कौन छोटा, कौन बड़ा? वो तो सबकी सुनते हैं।”
“बड़ी मेहरबानी आपकी मैडम जी, सौ साल जिये आपका बेटा।”
भोला वो एक सौ नब्बे रूपये अपनी फटी सी पैंट की चोर जेब में छुपाते हुए, खुशी-खुशी आगे बढ़ा जा रहा था।मन में छोटे-छोटे सपने बुनती,भोला की मुस्कुराहट बता रही थी कि आज उसकी छोटी सी दुनिया में एक और फूल खिलने वाला है, सपने बुनते कब वो सड़क पर पहुंच गया, उसे पता ही नहीं चला।
 

तभी सड़क पर आ रही कुछ आवाजों से उसका ध्यान टूटा। 

एक पुलिस वाला और एक हवलदार उस टूटे हुए तार के पास खड़े होकर उसे देख रहे थे। 

भोला चुपचाप ठेला लेकर आगे बढ़ने लगा। तभी अपने साहब के इशारे पर हवलदार ने उसे रोका। 

“अरे ठेले वाले, रुक जरा।” 

“जी साहब, 
अच्छा हुआ आप आ गए। 

ये तार मेरे सामने ही टूटा बस कोई हादसा ना हुआ आप यही समझ लो।” 

“हमारे साहब के रहते हादसा नहीं होता यहां।” 
हवलदार अपनी हथेली पर सुर्ती रगड़ते हुए भोला पर रोब झाड़ रहा था। भोला बिना कुछ जवाब दिए चुपचाप खड़ा हो गया। 

“सुन, तू एक काम कर, इस बिजली के तार के चारों ओर ईंट और पत्थर रख दें ताकि आने जाने वाले को पता चले कि यहां तार गिरा हुआ है।” 

“सुना नहीं तूने, साहब ने क्या कहा?” 
हवलदार ने भोला को डंडा दिखाते हुए हड़काया। 
 

“साहब बिजली तो नहीं है, इसमें?” 

“फोन कर दिया था हमने, तू ईंट रख इसके चारों ओर।” 
 

“साहब, बहुत देर हो रही है।” 

“चुप, साहब को मना करता है?” 

 

भोला ने हवलदार के इशारे पर बेमन से ईंट उठाई। बरसात में गीली हुई काई लगी ईंट जैसे ही कीचड़ के संपर्क में आई, उस कीचड़ में डूबे तार ने भोला को चट चट की आवाज के साथ किसी चुंबक की तरह खुद से चिपका लिया। तार में दौड़ती बिजली की तरंगे उसके शरीर का खून तेजी से सुखा रही थीं और पुलिस वाले ये सब स्तब्ध हो कर देख रहे थे। उन्हें कुछ समझ आता और वो कुछ फुर्ती दिखाते, तब तक बिजली की तारे भोला के शरीर को झुलसा चुकी थीं।

“साहब, मर गया, लगता है?”

“आप मुझे ईट रखने के लिए कह रहे थे। आज तो भगवान ने बचा लिया। मेरे छोटे-छोटे बच्चे अनाथ हो जाते।” 

“तुमने बिजली कटवायी नहीं थी क्या? 

“फोन तो किया था साहब, नींद में लग रहा था, फोन सुनकर सो गया होगा।” 

“तुम यहीं रुको, मैं बिजली कटवा कर आता हूं। कोई पूछे तो बोलना तार की चपेट में आ गया।” 

थोड़ी देर बाद हवलदार के फोन पर घंटी बजी….. 

“जी साहब, ठीक है। 

साहब, हम पता किए थे। ये ठेला वाला पास में ही रहता था इसके ठेले पर लदवा कर लाश इसके घर भिजवा दे रहा हूं……

दोस्तों मैंने ये कहानी एक सत्यघटना पर लिखी है और ये बताने की कोशिश की है कि कैसे किसी की छोटी सी लापरवाही उस गरीब की जान ले लेती है जिसकी ज़िंदगी की कोई क़ीमत भले ही उनकी नज़र में नहीं थी लेकिन अपने परिवार के लिए वो पूरी कायनात था।
"अफसोस यही है कि किसी के लिए ये पूरी कायनात है और हमारे लिए अखबार के एक कोने में छपी चार लाइन की ख़बर है जिसे सच कहूँ तो कोई ध्यान से पढ़ता भी नहीं।"

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