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संतान को जन्म ना दे पाने का आरोप हमेशा औरत पर ही क्यों?

पढ़िए आज एक और औरत से जुड़ी गंभीर समस्या एक कहानी के रूप में। इस कहानी का शीर्षक है- बांझ, लेकिन क्या सच में?

बांझ, लेकिन क्या सच में??

मौसमी का एक छोटा सा परिवार था। उसके पति विवेक का ट्रांसफर दूसरे शहर में हुआ था। इसलिए आज ही वह अपने पति और अपनी छोटी सी बेटी कुहू के साथ नए शहर के एक सुंदर से टू बीएचके फ्लैट में शिफ्ट हुए थे। नए-नए शहर में, नई-नई ऊर्जा के साथ, मौसमी अपने नए घर को अपने सपनों का घर बनाने में लगी थी। 

अपनी बेटी के फोटो को हाथ में लेकर यही सोच रही थी,”इसे किस दीवार पर लगाऊँ? जिसे देख कर मेरा पूरा घर खिलखिलाए।” तभी अचानक बर्तनों के गिरने की आवाज आई, मौसमी ने सोचा कुहू को तो काम मिल गया, शुरू हो गई आते ही। उसने अंदर जाकर देखा तो कुहू अपने पापा के साथ खेल रही थी। उसने विवेक से पूछा,”बर्तन इसने गिराया क्या?” “अभी तो गत्ता ही नहीं खोला बर्तनों का।” विवेक ने जवाब दिया। मौसमी कुछ और बोलती इसके पहले ही एक औरत के रोने की आवाज़ आ रही थी और कोई आदमी उसे जोरो से पीट रहा था। मौसमी भागती हुई बालकनी पर जा खड़ी हुई। जहां से एक-एक आवाज बिल्कुल साफ सुनाई दे रही थी। उस आदमी की आवाज़ उसे कुछ पहचानी सी लग रही थी। मौसमी का दिल बैठा जा रहा था। विवेक उसकी तकलीफ को समझ रहा था। उसने समझाया,”अपना काम करो, मियां बीवी का झगड़ा होगा, हमें क्या करना है?” मौसमी छटपटा कर रह गई पर विवेक की बात मानने के अलावा उसके पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं था।


कुछ दिन बीते थे और मौसमी अपने नए घर के अनुकूल होने की कोशिशों में लगी थी, पर उस दिन की घटना को भूल नहीं पा रही थी। विवेक ऑफिस गए थे। कुहू को सुलाकर मौसमी अपने काम जल्दी जल्दी निपटाने में लगी थी। दरवाजे पर डोर बेल बजी, दूध वाला था। मौसमी को दरवाजा खोलने में देर हो गई। इसलिए वो बगल वाली पड़ोसन के भगोने में दूध डालने लगा। पड़ोसन से मिलने की उत्सुकता में मौसमी थोड़ा आगे बढ़ गई। उसने अपनी नई पड़ोसन से थोड़ा जान-पहचान की और बातों-बातों में उसने अपने बगल के घर में मचे उस शोर के बारे में जानने की उत्सुकता दिखाई। 

मौसमी के थोड़ा सा बात छेड़ते ही, उस नई पड़ोसन ने तो उसके घर का एक-एक कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया। वो बोली,” आपने भी सुन लिया क्या शोर उनके घर का, पूरी सोसाइटी परेशान है इस आदमी से, बहुत मारता है ये उसे। आपके घर से तो साफ साफ सुनाई देता होगा?” मौसमी बोली,”हां, मैं तो परेशान हो गई थी उस दिन, कोई शिकायत क्यों नहीं करता है इसकी?”

“कितनी बार शिकायत की है सोसायटी के लोगों ने इसकी, एक बार तो पुलिस भी आ गई थी। पर इसकी वाइफ ही इसे बचा लेती है। बोलती है बाथरूम में फिसल गए थे। हम ही चोर बनकर रह गए थे।”

संतान ना होने

“बच्चे कितने हैं इसके?”मौसमी ने पूछा। “बच्चे ही तो नहीं है, इसी बात की तो सजा दे रहा है उसे, बात-बात पर बांझ बोलता है उसे, ना कहीं उसे जाने देता है और ना ही किसी से मिलने देता है और ना ही वो किसी से बात करती है। सारा दिन वो घर में बंद रहती है, ना जाने किस तकलीफ से गुजर रही होगी बेचारी? आज 2 साल से यही चल रहा है, बस।” पड़ोसन ने दुख जताते हुए बताया। 

मौसमी कुछ और पूछती इसके पहले ही उसे कुहू की आवाज आई और वो अंदर आ गई पर उसका मन अभी भी पड़ोसन की बातों से छटपटा रहा था।

मौसमी अपने मन में ही योजना बनाने लगी, अगर इस बार आवाज आई तो उसे क्या करना है? बस हर हाल में वह उसे मार खाने से बचाना चाह रही थी।

शाम को मौसमी विवेक के ऑफिस से आने का इंतजार कर रही थी। तभी उसे पड़ोस के घर मैं कुछ आवाजें फिर से सुनाई दीं। वह भागी-भागी बालकनी पर खड़ी हो गई। वो आदमी जोर-जोर से चिल्ला रहा था,”जितना तेरी जुबान चलती है, उतना अगर तेरी कोख ने भी काम किया होता तो आज दुनिया मुझे बेऔलाद नहीं कहती।” उसकी आवाज मौसमी को बेचैन कर रही थी,”कहीं तो सुना है मैंने इस आवाज को।”

अब तक विवेक भी आ चुका था। इस बार मौसमी खुद को रोक ना पाई और उसके फ्लैट की ओर भागी। पीछे-पीछे विवेक भी कुहू को लेकर गया। मौसमी ने बेल बजाई और करीब 5 मिनट के बाद दरवाजा खुला। अंदर से जबरदस्ती मुस्कुराती हुई चेहरे के हर दर्द को छिपाती, एक औरत ने दरवाजा खोला। उसकी नकली मुस्कुराहट उसकी तकलीफ को बिना कुछ कहे ही बयां कर रही थी। मौसमी ने बड़ी सहानुभूति से उस महिला की तरफ देखा और पूछा,”आप ठीक तो है ना?

क्यों बर्दाश्त कर रही हैं आप यह अत्याचार?” “जी, मैं समझी नहीं, कैसा अत्याचार? यहां तो सब ठीक है।” उस महिला ने जवाब दिया। मौसमी कुछ समझ नहीं पा रही थी कि आगे वह अब क्या बोलें। तब तक अंदर से उसका पति बाहर आया और लगभग मौसमी पर चिल्लाते हुए कहा, “बहुत शौक है आपको, दूसरों के घर में घुसने का?” अब विवेक आगे था, उस आदमी से निपटने के लिए। दोनों में बातचीत हो रही थी।

संतान ना होने
अबतक आसपास के लोग भी इकट्ठा हो चुके थे। तभी मौसमी उस आदमी को देखकर जोर से चिल्लाई,”तुम नंदकिशोर हो ना?” अचानक सारा माहौल शांत हो गया। सब आश्चर्य से मौसमी को देख रहे थे। मौसमी ने सवाल फिर से दोहराया,” तुम नंदकिशोर हो ना, गोरखपुर से?और यह तेरी दूसरी पत्नी है?”

इस आखिरी सवाल को सुनते ही उस आदमी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। उसकी पत्नी भी अवाक रह गई और मौसमी से बोली,”मैं इनकी पहली पत्नी हूं, पहली भी और आखिरी भी।” मौसमी ने उसे चुप कराते हुए उस आदमी की तरफ देखा और बोली, “जवाब दो इसे नंदकिशोर।” उसकी नजरें झुकी हुई थी।

संतान ना होने

अब विवेक ने मौसमी से पूछा, “तुम इन्हें कैसे जानती हो?” इस सवाल का जवाब सुनने के लिए वहां खड़ा हर इंसान मौसमी की तरफ बड़ी उत्सुकता से देख रहा था। मौसमी के स्वर में क्रोध साफ झलक रहा था। उसने बताया, “इसकी पहली शादी मेरी एक सहेली से हुई थी। शादी में मैं भी गई थी, वहीं इससे बात की थी मैंने। तू भूल गया शायद, पर मैं तुझे कभी नहीं भूली। तब हम ग्रेजुएशन कर रहे थे। शादी के 2 साल में ही इस आदमी ने मेरी दोस्त की जिंदगी नर्क बना दी थी। उसके घरवालों ने ही छुटकारा दिलवाया था उसे, इस जल्लाद से। उस पर भी इसने बांझ होने का आरोप लगाया था।

“वैसे मर्दानगी के पुंज तुम्हें विश्वास नहीं होगा पर वो बाँझ अब दो बच्चों की मां है।” मौसमी ने आक्रोश भरी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया। 

मौसमी की बात सुनते ही उस आदमी के चेहरे की हवाइयां उड़ गई। उसकी पत्नी निढाल होकर फर्श पर गिर गई।

संतान को ना जन्म देना या बांझ होने का जो आरोप इतने सालों से झेलते हुए जिस अपराधबोध में वो जी रही थी, आज शायद वो बोझ उसके दिल से उतर गया था।

अब अपने मन और शरीर पर लगी चोटों का दर्द उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मौसमी ने उसे सहारा दिया।

विवेक बड़े गर्व से अपनी पत्नी को देख रहा था। पास खड़े लोगों में फुसफुसाहट शुरू हो गई थी। विवेक ने बड़े प्यार से मौसमी का हाथ पकड़ा और दोनों घर की ओर जाने लगे। जाते-जाते मौसमी उस आदमी से बोली,

“नपुंसकों का इलाज तो हो सकता है पर तुम जैसे मानसिक नपुंसकों के लिए कोई दवाई नहीं बनी है। इसे मारने के बजाय अगर अपना इलाज कराया होता या फिर एक बच्चा गोद ले लिया होता, तो उस बच्चे के साथ-साथ तुम दोनों की जिंदगी भी संवर गई होती।”

उस आदमी की झुकी नजरें शायद उसे अपनी गलती का आभास करा रही थी। शायद आज पहली बार उसे किसी ने आइना दिखाया था। जिसमें उसे अपनी शक्ल बहुत बद्सूरत दिख रही थी।

दोस्तों, आज की कहानी भी हर उस औरत से जुड़ी है जिनके आँचल सूने है लेकिन इस सूनेपन की जिम्मेदार वो नहीं हैं। गाँव हो या शहर अक्सर पुरूष के पिता ना बन पाने का आरोप परिवार और समाज औरत पर ही थोप देता है। जबकि कमी पुरूष में भी हो सकती है। कहानी लिखने का उद्देश्य सिर्फ़ यही कहना था कि आजकल मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है। आज लगभग हर समस्या और हर बीमारी का इलाज संभव है बस कमी है तो जागरूकता की। इसलिए अपनी कमी को छुपाने के लिए अपनी पत्नी के जीवन को नर्क बनाना आखिर कहाँ की मर्दानगी है

Pragya Akhilesh
Pragya Mishra
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