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तुम्हारी सजा क्या होगी?

तुम उसे कैसे माफ कर देते?वो तो फिर भी ज्यादा उम्र वाली थी। तुमने तो 5 साल वाली को भी माफ नहीं किया और फिर क्या बड़ी बात हो गई जो तुमने बिना उससे जबाब मांगे, उसके आंचल में हाथ डाल दिया? 

पूछ लेते तो शायद मौका चूक जाते। तुम यह बेहतर जानते थे कि उसकी कोई गलती नहीं थी।अब ऐसे मौके रोज-रोज तो मिलते नहीं। तुम डर गए कि कहीं वो कोई ऐसा तर्क ना रख दे, जो तुम्हारे अंदर भी इंसान जगा दे। 

लेकिन तुम डरो नहीं। 

तुम जागोगे कैसे? 

मैंने तुम्हें कभी इंसान बनाया ही नहीं। जब तुम मेरे शरीर से नंगे बाहर आए तो मैंने तुम्हारा चेहरा नहीं, तुम्हारा लिंग देखा। तुम्हें देखते ही मेरा रोम रोम जी उठा। मैं बहुत खुश थी कि अब कोई मुझे ताने नहीं मारेगा क्योंकि अब तो मैंने तुम्हें जन्म दिया। 

मैं नहीं जानती थी कि मैंने उस दिन ही पहली गलती की थी। 

तुम्हारी नन्हीं सी बहन की मालिश करने के लिए मैंने दरवाजे की आड़ ढूंढी और तुम्हें नहलाकर जैसे ही बाहर ले आयी तुम मेरा हाथ छुड़ाकर भागे और घंटो नंगे घूमते रहे। सब कहते, तुम बड़े चंचल हो। तुम्हारा नंगा नाजुक अंग पूरे घर की क्रीड़ा की वस्तु बना और मैं कुछ नहीं बोली। 

Photo by Jyotirmoy Gupta on Unsplash

जब तुम दद्दा के साथ चारपाई पर बैठ राम मिलन के नाती को अपनी तोतली आवाज में गरिया रहे थे मैं तब भी तो हंसी थी। 

मैंने जेठ की तपती दोपहरी में तुम्हारी चप्पल उतरवाकर तुम्हें नंगे पैर क्यों नहीं खड़ा करवाया? 

क्यों नहीं डराया मैंने तुम्हें कि तेरी ज़बान गर्म चिमटे से दाग दूंगी?

तुमने अपनी तोतली जुबान में ही मां, बहन, बेटी, सब को तार दिया और मैं चुप रही।

कभी डांटा भी तो मुझे मेरे बड़ों ने डांट कर चुप करा दिया। उस दिन के बाद तो तुम भी जान गए कि मुझे कैसे चुप कराना है? 

जब तुम अपनी बहन को किसी से सुना हुआ ज्ञान बरसाते कि उसके जन्म के बाद मेरा कद घट गया वरना जब तुम हुए थे तो मेरा कद बहुत ऊंचा था। मैं सुनकर मुस्कुराती और तुम्हारी बहन के सामने तुम्हारी बात पर मोहर लगा देती।

जब मैं तुम्हें डॉक्टर के पास लेकर गई तो सुई की चुभन का दर्द, तुम्हारे मुंह से गाली बनकर निकल रहा था। डॉक्टर तुम्हें गुस्से में और दर्द दे रहा था और तुम उस दर्द के जवाब में उसे गाली दे रहे थे। उस दिन तो सिर्फ मैं ही नहीं मेरे अगल-बगल बैठी वो सब की सब हंसी। हम तुम्हारी हरकत पर हंसते रहें और तुम रो-रोकर गालियां बकते रहे। एक भी थप्पड़ नहीं जड़ा मैंने तुम्हारे गाल पर, अगर उस दिन जड़ दिया होता तो आज पड़ रहे थप्पड़ की गूंज मेरे अस्तित्व को आहत न करती। 

जब तुम बाहर खेलने के लिए निकले तो मैंने कभी नहीं पूछा कि कहां जा रहे हो?

मैनें तुम्हारे सामने ही दरवाजे पर खड़ी तुम्हारी बहन को डांटकर अंदर किया।उसदिन तो तुम भी ये जान गए कि वो दरवाजे पर भी खड़ी नहीं हो सकती।  

तुम जब ठीक से करके धो भी ना पाते थे, तभी यह सीख गए कि अगर दरवाजे पर वो खड़ी हो गई तो गंध फैल जाएगी और तुम तो आए ही थे, सुगंध फैलाने। 

फैला भी रहे हो, है ना?

अब तो तुम बड़े भी हो गए हो। मैं तो तुमसे अब डरने भी लगी हूं और कहती हूं, 

“बड़े हो गए हो, तुम्हें मैं मारूं, कहीं पलट कर मुझे भी मार दो, तो क्या इज्जत रह जाएगी?”

जो इज्जत मुझे किसी ने ना दी, ना जाने उस इज्जत की उम्मीद मैं तुमसे क्यों लगाए बैठी थी? 

तुमने ज़िद की,सब के पास टच फोन है। तुम्हें भी चाहिए। पढ़ाई में दिक्कत होती है। कोचिंग में सर जो पढ़ाते हैं, वह ठीक से समझ नहीं आता। नेट चला कर पढ़ेंगे तो जल्दी समझ में आएगा। मेरे सारे दोस्त ऐसे ही पढ़ते हैं। 

इतना काफी था, मेरे मन में अपराधबोध जगाने के लिए। मैं लड़ पड़ी सबसे, अपने लिए किसी से कुछ नहीं मांगा, लेकिन तुम्हारे लिए मेरे पास अनेको तर्क थे। 

अंततः तुम्हारे हाथ में मैंने तुम्हारी बर्बादी तुम्हारा टच फोन रख दिया। तुम रात दिन कमरा बंद करके पढ़ते रहे और मैं निश्चिंत रही और शायद खुश भी कि मैंने अपना फर्ज निभाया। 

जब परीक्षा का दिन आया, तो तुम डर गए कि जब रिजल्ट आएगा तो सब जान जाएंगे कि तुमने उस फोन पर आज के दिन लिखने लायक कुछ नहीं पढ़ा। 

तुम्हारा स्कूल बंद हो जाए इसलिए तुमने एक नन्हे से बच्चे की गर्दन भी काट दी। मैं फिर से रोयी कि तुम ऐसा कर ही नहीं सकते। तुम्हें फंसाया जा रहा है। 

जब तुम पढ़ने घर से बाहर गए और हॉस्टल में रहने लगे। तब वहां पहुंचकर तुमने उस फोन का असली सदुपयोग सीखा। पहली बार जब घर लौटे तो बोल्ड हिंदी फिल्म की सीडी लेकर, साथ में एक दो पारिवारिक फिल्में भी और अपनी बहन को सख्त हिदायत दी कि सिर्फ यही फिल्में देखें उस सीडी को हाथ भी न लगाएं। वो डर गई क्योंकि मैंने भी उसे ज़ोर से घूर दिया था। लेकिन मैंने तुमसे क्यों नहीं पूछा कि तुमने यह फिल्म क्यों देखी? 

आखिर अभी बहुत बड़े तो तुम भी नहीं हुए थे। लेकिन मैं पूछती क्यों? छोटे तो तुम जन्म से ही नहीं थे। 

अब तो तुम्हारे पास लैपटॉप भी है। मैंने बड़ी मुश्किल से एफ डी तुड़वाकर तुम्हारे लिए खरीदा। ताकि तुम्हारी पढ़ाई ना रुके और रुकी भी तो नहीं। 

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अब तो तुम्हारे लैपटॉप में हर रात तुम वो देख रहे हो, जो तुम देखना चाहते हो, बिना किसी रोक-टोक के। 

उसे सिर्फ लैपटॉप में देख कर तुम्हारा मन नहीं भरता इसलिए तुमने अपना फोन उसके बाथरूम में रख दिया। जैसे-जैसे तुमने चाहा तुम्हारे फोन की आंख ने उसे देखा। 

इसके आगे भी तुमने कई पाप किये, मैं कुछ नहीं बोली। 

जब-जब तुम पर आरोप लगा, मैं ढाल बनकर खड़ी हो गई कि तुम बिल्कुल ऐसे नहीं हो। 

बस छोटी-छोटी गलतियां हो जाती हैं। 

और क्या लिखूं? 

ये छोटी-छोटी गलतियां, तुम करते गए और मैं उसे ढ़कती गई।

फिर तुम मुझे माफ कैसे करोगे?  

आज तक जब तुमने किसी को माफ ना किया तो उसे ही कैसे कर देते ?

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लेकिन माफ तो ‘वो’ भी तुम्हें नहीं करेगा। 

वो कुछ थे जो हस्तिनापुर के विध्वंस का कारण बने और तुम? 

तुम दुशासनो की सजा क्या होगी? 

उस प्रलय का इंतजार करो।जो तुम्हारा विध्वंस करेगी।क्योंकि तुम्हारा विध्वंस तो निश्चित है। 

प्रज्ञा अखिलेश

🙏

(इस लेख में सिर्फ़ इतना ही कहना है कि ‘जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए।’ गलत परवरिश का परिणाम सदैव गलत ही होता है।)

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