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छुटकन का गुल्लक

“ये सौ और ये एक सौ एक….अरे वाह हो गये पूरे सौ रूपये एक रूपया बच भी जायेगा।” छुटकन सिक्के गिनते खुशी से नाच रही थी।

“अरे छुटकन इतना शोर क्यों मचा रखा है? क्या हुआ?” अम्मा बोली। 

“हम आज अपने गुल्लक मे पूरा एक सौ एक रूपया जोड़ लिए। अब देखना अबकी दिवाली हम वो लटकन वाला सतरंगी झुमका जरूर खरीदेंगे।” छुटकन कि वो मासूम अमीरी उसके चेहरे पर खुशी बनकर झूम रही थी। 

“ये एक सौ एक रूपया कहां से आया तुम्हारे पास? कौन दिया तुमको?” अम्मा बड़े आश्चर्य से पूछ रही थी। 

“कोई नहीं दिया अम्मा, ये हमारा पैसा है। आज से नहीं जोड़ रहे हैं हम, ये पैसा। पूरा तीन महीना हो गया। पिछली बार जब हम बाबा के साथ बाजार गए थे, तो एक चूड़ी बिंदी वाली दुकान पर सतरंगी झुमका टंगा था। हम जब दाम पूछे तो दुकानदार सौ रूपये बताया। तब से एक-एक रूपया जोड़ के ये गुल्लक भर दिए। आज तीन महीना हो गया, ना तो हम चूरन खरीदे और ना ही मटका वाली कुल्फी। तुम जो मेला से ये गुल्लक लाई थी ना, उसमें चाकू से खुरच- खुरच के सिक्का निकालने में की जगह बना दिए थे। तब से रोज रोज गिनते थे। आज जाकर सौ रुपया हुआ।” छुटकन ने अपनी अम्मा को पूरा विवरण दिया। 

“तू अभी सातवीं में पढ़ रही है। झुमका पहन के कहां जाएगी।” अम्मा बोली। 

“अब देखो अम्मा हम ये पैसा जोड़ लिए हैं। अब तुम मना मत करना। सब पहनते हैं आजकल। हमको भी चाहिए बस।” छुटकन ने पैर पटकते हुए कहा। 

“अच्छा ठीक है, बाजार शाम को जाना है, अभी बहुत टाइम है,अपना गुल्लक रख दो, कल दिवाली है, बहुत काम है। जाओ जाकर चाय बनाओ। तुम्हारे बाबा कब से मांग रहे हैं।”अम्मा बोली। 

छुटकन ने खुशी-खुशी अपना गुल्लक सहेज कर रखा, चाय बनाई और अपने बाबा के कमरे मैं लेकर गई। 

उसके बाबा कलम और कॉपी लिए हिसाब जोड़ रहे थे, “इतना कटौती के बाद भी नब्बे रूपया अभी भी कम पड़ रहा है। मिठाई की जगह इस बार पेठा रख देंगे मुंह मीठा करने से मतलब है। पटाखे में इस बार छुटकन वाली चकली ही लाएंगे बस। बहुत धुआं हो जाता है पूरे घर में।” 

छुटकन ने बाबा को चाय दी। उसके बाबा ने उसे देखते ही उससे अपने हिसाब वाली किताब छुपाई और उसे जल्दी से तैयार होने को कहा।  

छुटकन ने रास्ते में अपने बाबा को रुमाल में बंधी वो एक सौ एक रूपये की छोटी सी पोटली पकड़ाई और कहा, “बाबा हमको पेठा अच्छा नहीं लगता, इससे आप मिठाई ले लेना और इस बार ना हम कम धुआं वाला पटाखा ही खरीदेंगे। हम दोनों मिलकर दगाएंगे, बड़ा मजा आएगा। अम्मा को खूब डराएंगे, कैसे कान बंद करके भागती है ना?” 

उसके बाबा अपने अंगोछे से आंख साफ करते हुए बोले, “मच्छर चला गया हमारी आंख में।” 

घर आकर अम्मा बोली, “देखूं तो जरा तेरे सतरंगी झुमके।” 

छुटकन बोली, “अरे अम्मा, वो बिक गए थे और जो थे वह हमको पसंद नहीं आए।

अम्मा बोली, “तुम्हारी पसंद तो भगवान ही पूरी कर सकते हैं।”

प्रज्ञा अखिलेश 

(दीपावली के शुभ अवसर पर आप सभी समर्पित ये कहानी जिसमें जाने अनजाने हम सभी छुटकन रहे हैं, जहाँ है तो भी अच्छा और नहीं है तो भी, लेकिन जीवन के अभावों को अपने परिवार की खुशियों पर हावी नहीं होने दिया। ऐसे ही इस छोटे से गुल्लक ने एक परिवार की दीवाली को रोशन कर दिया। इसलिए घर अगर बेटी है तो घर तो अपनेआप ही रोशन रहेगा।आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं)

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