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आधा किलो चावल

भूख की तपिश में झुलसता स्वाभिमान 

(पढ़िए आज एक और कहानी, छोटे कस्बे में बरसात में फफूंदी की तरह खुले नर्सरी स्कूलों के शिक्षकों की समस्या पर जिन्हें मानदेय के नाम पर जो राशि दी जाती है वो किसी दिहाड़ी मजदूर के एक माह की मजदूरी का आधा होता है। कहानी का शीर्षक है- आधा किलो चावल)

आधा किलो चावल

सेठाइन……..चावल चाहिए था।”

अंजू की बात को किसी ने नहीं सुना। दुकान पर चार-पांच लोग खड़े अपने-अपने सामान खरीद रहे थे।अब वो भीड़ के छंटने का इंतजार करने लगी।जैसे ही आखिरी आदमी सामान का थैला लेकर हटा, अंजू ने फिर से बोलने की हिम्मत की।

“सेठाइन, मेरे लिए भी चावल तौलवा दो।

“अरे छोटुआ, चावल तौल इनका भी।” सेठाइन ने अपने नौकर को आदेश दिया।  

“कौन सा तौलूं, टीचर जी?” 

“अभी कान के नीचे दो धरेंगे ना, तो सारा खीस निपोरना निकाल देंगे। वो क्या यहां बासमती खरीदने आई है? वहां देख कोने में ₹20 किलो वाला मोटा चावल पड़ा होगा, वही दे दे।” सेठाइन अपने नौकर के प्रश्न पर झल्लाकर बोलीं। 

“कितना तौलूं, टीचर जी?” 

छोटुआ की व्यंगात्मक हंसी अंजू को किसी तीर की तरह चुभ रही थी। उनके व्यंग उसके आत्म सम्मान को तार-तार कर रहे थे। लेकिन उसने धैर्य बनाए रखा। तब तक सेठाइन फिर बोलीं, 

“एक किलो तौलो और कितना?” 

“नहीं, नहीं सेठाइन, बस आधा किलो चाहिए।” 

यह बोलकर अंजू अपनी बंद मुट्ठी में मुड़े हुए दस के नोट को छुपाकर सेठाइन को देने लगी।  

एक कागज के ठोंगे में छोटू ने आधा किलो चावल तौल दिया।

“सेठाइन पॉलिथीन में दे दो, ये ठोंगा रास्ते में फट जाएगा।” अंजू निवेदन के स्वर में बोली।

“पॉलिथीन बिकना बंद हो गई है।”

“लेकिन अभी तो आपने मुझसे पहले वाले ग्राहक को दी।”

तुमसे पहले वाले ग्राहक ने यहां से ₹300 का सौदा खरीदा है।आधा किलो चावल के लिए पॉलिथीन फालतू नहीं है, मेरे पास।” 

“कोई बात नहीं सेठाइन, ऐसे ही दे दो।” 

अंजू की विनम्रता से द्रवित होते हुए सेठाइन बोली, 

“इस स्कूल में क्यों अपना खून जला रही हो टीचर जी? एक हजार रुपए की नौकरी कर रही हो। तुमसे ज्यादा पैसा तो हम अपने छोटुआ को देते हैं। 
क्यों रे छोटुआ, कितना पैसा मिलता है, तुमको?”

“1500 रूपये , सेठाइन।” 

“बताओ, अपने नौकर को हम 1500 रूपये  देते हैं। इस एक कमरे के नर्सरी स्कूल में कुल 50 बच्चे भी नहीं है। इनको गला फाड़-फाड़कर पढ़ाती हो। यहां तक आवाज आती है। फिर भी ये लोग कुल एक हजार रुपया तुमको देते हैं। 

खर्चा कैसे चलता है? 

इससे अच्छा तो कहीं झाड़ू पोछा पकड़ लो। एक घर के डेढ़ से दो हजार तो कहीं नहीं गए हैं।अगर कहो तो हम बात करें।”

“तमीज से बात करो, सेठाइन, मैं पढ़ी-लिखी हूं।” 

अंजू सेठाइन को झड़पते हुए, बहुत स्वाभिमान के साथ सर उठाकर चावल का ठोंगा अपने आंचल में दबाकर घर को चल दी। 

घर पहुंच कर….. 

उसकी बेटी नल के पानी से सीमेंट की बोरी धो रही थी।

“आज तुम स्कूल क्यों नहीं गई?” 

“मन नहीं हुआ, इसलिए।” 

“स्कूल तुम्हारे मन के मुताबिक चलता है क्या? जब मन करे जाओ जब मन करे छुट्टी कर लो।”

“सरकारी स्कूल मन मुताबिक ही चलता है।”

“ये सीमेंट की बोरी कहां से लाई?” 

“तुमने अपना महल बनवाने के लिए जो सीमेंट की बोरियां मंगवाई हैं न, उसी में से एक निकाली।” 

“आज कुछ ज्यादा ही तेवर बदले हैं तुम्हारे।” 

“क्योंकि भूख लगी है, मुझे।” (अत्यंत उच्च स्वर में) 

“सुबह जो 3 रोटियां बना कर गई थी वो मैं तीन बार में खा चुकी हूं। एक रोटी खाकर दो गिलास पानी पिया ताकि पेट भर जाए। लेकिन महीने की 20 तारीख के बाद कभी पेट भरा है हमारा, जो आज भरेगा। 

21 तारीख के बाद मुझे डर लगने लगता है कि अब या तो नमक रोटी खाने को दोगी या नमकीन चावल बनाओगी।आज क्या लेकर आई हो, चावल या आटा? 

स्कूल 1:00 बजे बंद हो जाता है और 2:00 बजे लौट कर आ रही हो, पूछ तो मैं भी सकती हूं कि कहां थी अब तक?” 

“बहुत बकवास सुन ली तेरी, अब सच-सच बोल ये बोरी कहां से लाई? वरना, मार-मार के मुंह लाल कर दूंगी, तुम्हारा।” अंजू गुस्से में तमतमाते हुए बोली। 

“तो मारो ना, मैं तो कहती हूं, मार ही डालो। ये जो भिखारियों की जिंदगी है, इससे जान छूटेगी। 
अब ना मुझसे तुम्हारी गरीबी बर्दाश्त होती है और ना ही यह तुम्हारा ये खोखला स्वाभिमान। 

जब तक मैं तुम्हें नहीं बताऊंगी, तुम ये चावल नहीं उबालोगी, है ना?

मैं ये बोरी, सड़क पर जो दुकान बन रही है, वहां से मांग कर लायी। मेरे पास ₹1 भी था, मैंने दिया भी, लेकिन वो दुकान वाले ने लेने से मना कर दिया। ये बोरी मुझे स्कूल में बैठने के लिए चाहिए। सरकारी स्कूल में बैठने के लिए दरी पूरी नहीं पड़ती। जमीन पर बैठना पड़ता है। इसलिए सोचा अब अपने साथ बोरी लेकर जाया करूंगी। 

अब तो बना दो कुछ खाने को, मैं सच बता रही हूं, मुझे भूख के मारे अब चक्कर आ रहा है।”

“कल जाकर उन्हें ₹2 दे देना। अगर मना करें तो जबरदस्ती दे देना। किसी का मुफ्त में कुछ नहीं खाना चाहिए।” बेटी को समझाते हुए अंजू स्टोव जलाने लगी।

उबले चावल नमक से खाने के बाद अंजू की बेटी के तेवर कुछ नरम हुए। उसने अपनी मां से कहा, 

“पापा के जाने के बाद हमारी क्या हालत हो गई है? जब तक वो ज़िंदा थे, घर-घर ट्यूशन पढ़ा कर ही सही, दोनों टाइम का खाना तो हमें खिलाते थे। मेरे पास भी चार पांच रुपया हमेशा होता था। स्कूल से लौटने पर मैं भी समोसे खा लेती थी। तुम्हारी कमाई से तो हमारा पेट भी नहीं भरता। अगर तुम कहो तो मैं भी कुछ काम ढूंढ लूं।”

अंजू ने उसे ज़ोर से डाँटा, “तुम सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। पेट भरने का इंतजाम मैं कर लूंगी। खाना खा लिया है तुमने, थोड़ी देर जाकर आराम कर लो। मुझे कहीं जाना है। अभी थोड़ी देर में आती हूं।” 

भूख की तपिश सबसे पहले इंसान के स्वाभिमान को झुलसाती है। 
अंजू फिर से सेठाइन की दुकान पर पहुँची और बोली,

“सेठाइन, झाड़ू पोछा लगाने का काम कितने घर में दिला दोगी?”

प्रज्ञा अखिलेश

( दोस्तों, इस कहानी को पढ़कर आप सबसे पहले यही कहेंगे कि कहाँ मिलते हैं आजकल हजार रुपये एक टीचर को?
लेकिन मैं सिर्फ़ इतना ही कहूँगी कि हजार रुपये तो मैंने ज्यादा लिख दिए इससे भी कम मानदेय पर अप्रशिक्षित और प्रशिक्षित स्नातक भी जुलाई में फंफूद की तरह खुले नर्सरी स्कूलों में पढ़ाने के लिए मजबूर हैं और लगभग हर प्राइवेट स्कूल में कार्यरत शिक्षकों का शोषण किसी से छुपा नहीं है। शिक्षा नाम पर व्यवसाय रहे स्कूलों में एक शिक्षक किस कदर शोषित है यही मैंने इस कहानी में लिखने की कोशिश की है।)

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